हमारे देश में विगत 60 वर्षों की लोकतांत्रिक व्यवस्था के दौरान राजनीति के क्षेत्र में तमाम प्रयोग किये गये। स्वतन्त्रता के पश्चात देश का शासन चलाने के लिये कांग्रेस पार्टी ही विकल्प के रूप में थी जिसके द्वारा देश के स्वतंत्रता आन्दोलन में महती भूमिका निभाई गई थी। आगे आने वाले वर्षों में कई अन्य दल राष्टीय स्तर पर तथा विभिन्न राज्यों में विकल्प देने के उद्देश्य से कई दलों का जन्म हुआ। प्रदेशों के स्तर पर क्षेत्रीय दलों को शासन चलाने का अवसर भी मिला। कई राज्यों में तो दशकों से क्षेत्रीय दलों की सरकारें रही हैं। प्रश्न यह उठता है कि राष्टीय दलों के रूप में या क्षेत्रीय दलों के रूप में जो विकल्प हमारे सामने आये उन्होंने जन आकांक्षाओं को पूरा करने तथा राष्ट को मजबूत, समृद्ध, सशक्त बनाने तथा सभी वर्गों, लोगों का विकास कर पाने में कितनी सफलता प्राप्त की। हमारे सामने आज यही प्रश्न सबसे मुख्य है कि क्या कोई राजनैतिक दल राष्ट् एवं जनता की आकांक्षाओं पर खरा उतरा या नहीं ?

इस प्रश्न का उत्तर देने के लिये पहले यह जानना होगा कि एक स्वतंत्र राष्ट् बनने के बाद एवं देश के रूप में क्या आकांक्षायें थी। इस प्रश्न का उत्तर मुश्किल नहीं है। स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व हमारा देश 200 वर्षों तक साम्राज्यवादी देशों का गुलाम रहा जिसके चलते न केवल आर्थिक रूप से उसका दोहन हुआ बल्कि पूरा का पूरा देश विपन्नता, गरीबी, अशिक्षा, बीमारियों से जकड़ गया। वस्तुतः स्वतंत्रता के पश्चात् देश के रूप में इन सभी कठिनाइयों से जूझकर उन्हें समाप्त करना तथा प्रत्येक नागरिक को एक कष्ट रहित सामान्य जीवन व्यतीत करने के लिये अनुकूल

परिस्थितियाॅं पैदा करना हमारा प्रथम कर्तव्य था। देश के रूप में इन सभी बिन्दुओं पर हमें आंशिक सफलता अवश्य ही मिली है तथा हम इस आंशिक सफलता का ठिंठोरा पीटकर अपने को संतुष्ट कर सकते हैं परन्तु जब हम चालीस के दशक में स्वतंत्र हुए राष्ट्ों की अपने देश से तुलना करते हैं तो हमें पता लग जाता है कि एक राष्ट् के रूप में स्वतंत्रता के बाद से अब तक की हमारी उपलब्धियाॅं संतोषजनक नहीं कही जा सकती हैं इस तथ्य पर कोई विवाद नहीं हैकि हमारा देश प्राकृतिक संपदाओं से भरपूर देश है तथा प्रकृति का पूरा आर्शीवाद हमें प्राप्त रहा है। फिर भी विकास की दौड़ में हम क्यों पीछे रह गये , यह प्रश्न हमें सदैव उद्वेलित करता रहता है।

इस दृष्टि से यह भावना बलवती होती है कि हम कहीं न कहीं व्यवस्था को प्रभावी ढंग से चलाने और उसे कुशल ,ईमानदार , सक्षम नेतृत्व देने में सफल नहीं हो सके। लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुने गये प्रतिनिधियों एवं राजनैतिक दलों पर ही यह दायित्व था कि वह सरकारों को ईमानदारी, निष्ठा, कर्मठता एवं बुद्धिमानी से चलायें तथा जन आकांक्षाओं की पूर्ति किया जाना सुनिश्चित करें। परन्तु ऐसा नहीं हो पाया यह स्वतंत्रता के बाद से आज तक के विकास के आॅंकड़े स्वतः ही स्पष्ट कर देते हैं। विगत 67 वर्षों के दौरान हम गरीबी, अशिक्षा, सड़क, बिजली, पानी, आवास, स्वास्थ्य सुविधाओं, रोजगार के अवसर, स्वच्छता, इमानदार एवं न्यायपूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था मुद्दों पर सफलता पाने से कोसों दूर है। आज भी हमारी शिक्षा प्रणाली इतनी लचर और कमजोर है कि आप के बच्चे मूलभूत शिक्षा से बंचित रह जाते हैं तथा विद्यालयों में शिक्षा का स्तर उठने के बजाय गिरता ही रहा है। इसी प्रकार गरीबी

हटाने की भी हमारी विफलता जगजाहिर हो चुकी है 30 करोड़ से अधिक लोग आज भी विपन्नता का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। युवाओं के लिये रोजगार के अवसर भी उपलब्ध करा पाने में हम सक्षम नहीं हो पाये क्योंकि देश में आज के वर्षों में जो विकास हुआ उसके सापेक्ष रोजगार के बहुत कम अवसर ही पैदा हुए। जन सामान्य अच्छी स्वास्थ्य सेवा से आज भी वंचित है वर्ष 2011 में हुई जनगणना के आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि हमारे देश में बहुत बड़ी जनसंख्या जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं जैसे आवास, बिजली, शुद्ध पेयजल, शौचालय, ईंधन आदि से वंचित है। भ्रष्टाचार का तो यह हाल है कि उपर बैठे लोग तो जैसे सभी के सब कुछ अपवादों को छोंड़कर केवल अवैध रूप से धन कमाने की होड़ में लगे हैं तथा राजनैतिक व्यक्तियों के लिये तो जैसे भ्रष्टाचार जीवन की शैली बन गया है झूठ बोलकर जनता को बेवकूफ बनाना आज की राजनीति का मूलमंत्र है क्योंकि झूठ बोलना हमारे देश में अब लगता है कि अपराध नहीं है और न ही सामाजिक रूप से इससे किसी को कोई गुरेज रह गया है। हम चाहें या न चाहें व्यवस्था में उपर बैठे लोगों को कानून के अनुसार दंडित कराने की क्षमता अब इस व्यवस्था में नहीं रह गयी है क्योंकि भ्रष्टाचार में वर्षों से लिप्त रहते इन उच्च पदों पर आसीन अथवा पूर्व में आसीन लोगों ने इतना धन सम्पदा, बाहुबल इकट्ठा कर लिया है कि ऐसे तत्वों के विरूद्ध बड़े से बड़े न्यायालयों में भी कानूनी लड़ाई लड़ना टेढ़ी खीर बन गया है । हालात यहाॅं तक बिगड़ गये हैं कि रिश्वतखोरी के अपराध में एक राज्य के मुख्यमंत्री को सजा दिलाने में व्यवस्था को 22 वर्ष लग गये वहीं इसके पूर्व मुख्यमंत्री चार वर्षों की सजा पाने से पहले बीस वर्षों से देश एवं प्रदेश में शीर्ष पर बैठकर व्यवस्था के

साथ खिलवाड़ करते हुए उसे और कमजोर और भ्रष्ट बनाने में सफलता के नये नये झण्डे गाड़ते रहे । उत्तर प्रदेश के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों के खिलाफ तो माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद तथा सी0बी0आई0 द्वारा तमाम सबूत इकट्ठा करने के बाद भी आज तक भ्रष्टाचार के मामले में मुकदमा दर्ज होने की नौबत नहीं आ सकी। आज भी यही भ्रष्ट राजनेता प्रदेश और देश की राजनीति की दशा एवं दिशा तय करते हैं। क्या ऐसे भ्रष्ट,अक्षम, अर्कमण्य, नौसिखिए लोगों को बाहर का रास्ता दिखाने का समय नहीं आ गया है।